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वोटों की राजनीति के लिए नफ़रत की नीति

Posted On 10 Apr, 2017 में

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पढ़ेगा इंडिया तभी तो बढ़ेगा इंडिया, एक तरफ़ बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, कभी डीजिटल इंडिया तो कभी मेक इन इंडिया । इन सब के बीच भारत माता की जय और फिर वंदेमातरम। देश प्रेमियों के साथ-साथ गौ रक्षकों की भरमार। देश में अगर रहना है तो भारत माता की जय बोलो, वंदेमातरम पढ़ो, अगर नाम मुसलमान का है तो गाय लेकर सड़क पर मत निकलो। बिरयानी अगर बनानी है तो मीट का सर्टिफ़िकेट होना लाज़मी है।

क्या देश में मुसलमानो के ख़िलाफ़ नफ़रत भरी जा रही है। क्या इस तरह नफ़रत और हिंसा से सारे हिन्दू एक जुट हो रहे हैं ? क्या सारे हिन्दुओं को ऐसा लगता है कि देश में सिर्फ़ उन्हें ही रहना चाहिए बाक़ि धर्म वालों के लिए हिन्दुस्तान में जगह नहीं? क्या अख़लाक़ का ख़ून हो या फिर पहलू ख़ान की हत्या, क्या सारे हिन्दुओं को ये लगता होगा की जो हुआ सही हुआ?

मुझे नहीं लगता कि जो सच में हिन्दू धर्म को जानता है, वो इन हत्याओं को कभी सही ठहराएगा। क्योंकि इंसान की हत्या को कोई भी धर्म जायज़ नहीं ठहरा सकता, जबतक की वो उस लायक़ क़सूरवार न हो।

गाय के नाम पर इंसानों की हत्या करने वालों से मेरा सवाल है, क्या उन्होंने जीवन में कभी गाय पे लाठी नहीं चलाई है ? ख़ासकर तब जब गाय ने उनके बाग़ीचे के फूलों को खा लिया हो, या कभी जब खेतों में घुस आई हो तब या फिर सड़क पे उनका रास्ता रोके खड़ी हो गई हो तब ?

क्यों सरकार ने ऐसे लोगों को लाइसेंस दे रखा है, वो जब चाहें जहां चाहें वहां क़ानून की धज्जियां उड़ा सकते हैं। वो लोगों को मार सकते हैं, उनकी हत्याएं कर सकते हैं।

ये संविधान ने उनको हक़ दिया है या उन्होंने संविधान को ताख़ पर रख दिया है ? ये अधिकार उनको देश या सरकार ने दिया है या फिर वो ग़ैर क़ानूनी तौर पर सक्रिय हैं। अगर सरकार ने क़ानूनी तौर पर उनको हक़ दिया है तब तो ठीक है, पर अगर ऐसा नहीं है तो फिर क्या असमाजिक लोगों पर से क़ानून की पकड़ ढीली हो गई या फिर वोटों की राजनीति के लिए नफ़रत की नीति अपनाई जा रही ???

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